Monday, May 17, 2010

कितने अच्छे दिन थे वो!!!!!

कितने अच्छे दिन थे वो
अब याद आती है उनकी|

इससे पहले, कभी भी
दोस्तों को न जाना हमने
ज़िन्दगी में इस तरह घुल-मिले थे वो
कि कभी न सोच पाए हम
कभी अलग भी होंगे ये पल

कितने अच्छे दिन थे वो
अब याद आती है उनकी|

ऐसा नहीं कि सिर्फ तसवीरें ही
छापती हैं छवि अब हम पर
हमें तो अब अपना बचपन नहीं
बचपन का हर अंदाज़ याद आता है
अंदाज़ अपना और उन दोस्तों का अब हमें भाता है
कितने अच्छे दिन थे वो
अब याद आती है उनकी|

ज़िन्दगी में आया ये विराम
हमें कितना कुछ सिखाता है
कितना और सिखाएगा?
पर विडंबना तो ये है
यही विराम अब सपनों में भी तडपता है
हमें क्यों अब अपने मित्रों का स्मरण हो आता है?
कितने अच्छे दिन थे वो
अब याद आती है उनकी|


Wednesday, May 5, 2010

Bachpan ki masumiyat (Part 2)

बचपन में जब तक हम अपने पुराने घर में रहे, मुझे बहुत ही विचित्र स्वप्ना आते थे| अगर मैं कोई अच्छा काम करता तो भगवन गणेश सपने में आकर  मुझे ice -cream  (मेरी पसंदीदा) दे जाते थे या फिर माता अम्बा प्रसाद देकर जाती थी| (बहुत अजीब लगता है न ये सब)| लेकिन अगर कोई बुरा काम करता तो bat मार कर जाते थे| कई बार नागों के सपने आते थे| अर्थ ये निकलता है कि कोई-न-कोई अद्भुत शक्ति मेरे स्वप्न में ज़रूर आती थी| और जब हम नए घर में आये और मुझे "१०४ डिग्री" बुखार हो गया तो १ हफ्ते तक मैं यही कहता रहा कि मुझे १ बार पुराने घर में ले चलो| आख़िरकार माँ-पापा मान ही गए| और वहाँ जाते ही मैं ठीक हो गया| कभी-कभी तो ये सब सोचकर ऐसा लगता है कि वहाँ पर सच में कोई शक्ति निवास करती है|

छोटे बच्चे बहुत मासूम होते हैं, सच में| माँ ने मुझे बताया कि जब मेरी दीदी हाई स्कूल में प्री-बोर्ड की परीक्षाएं अच्छे अंकों से पास कर चुकी थी तो वो बोर्ड के लिए एकदम निश्चिंत हो गयी थी और कुछ ख़ास तैयारी बोर्ड की नहीं की| जब परीक्षाफल घोषित हुआ तो दीदी ने पाया कि उसके अंक पहले से २० प्रतिशत कम थे| वो घर आकर रोने लगी कि पापा और खासकर मम्मी जो उसे पढने के लिए कहती रहीं, उसे बहुत डांटेंगे| मैं उस समय बहुत छोटा था और मेरी दीदी 8 साल बड़ी थी मुझसे| फिर भी मैंने उसे कुछ समझाया और वो (शायद) चुप हो गयी| मैंने माँ-पापा से कहा कि उन्हें न डांटे| उन्होंने एक छोटे-से बच्चे कि बात सुनी, उसे समझाया कि उसकी दीदी को डांटना उसके भविष्य के लिए क्यों ज़रूरी है और फिर दीदी को भी थोड़ी-सी डांट और थोड़े-से प्यार से समझा दिया|

ऐसी बहुत-सी "अद्वितीय" घटनाएं हैं जो मेरे साथ हुई हैं लेकिन "मानस-पटल" पर इतनी ही मौजूद हैं|

Bachpan ki masumiyat

"बचपन की स्मृतियों में एक विचित्र-सा आकर्षण होता है| कभी-कभी लगता है, जैसे सपने में सब देखा होगा|"
मैंने बचपन में अलग ही शौक पाल रखे थे जिन्हें याद करके आज बहुत हँसी आती है| जब मैं पहली या दूसरी क्लास में था, तब की बात है| मुझे पढ़ाने का बहुत शौक था| मैं रोज़ शाम मम्मी से यह कहकर कि मैं खेलने जा रहा हूँ, घर से बहार चला जाता था| और शायद कोई यकीन न करे, उस समय हमारे एक पडोसी के मुझसे भी छोटे बच्चों का पढने का समय होता था और मैं भी उनके माँ-बाप के साथ उन्हें पढ़ाने लग जाता था| कितना मज़ा आता था| शायद यही एक वजह है कि खेलने में मेरी ज्यादा रूचि नहीं है| आज भी जब मैं उन अंकल-आंटी से मिलता हूँ, तो वो येही कहते हैं, "तुम बहुत दिनों से पढ़ाने नहीं आये|" माँ भी मुझे यही ताना मरकर चिढाती रहती हैं|

दो घटनाएं ऐसी हुई जो दो-दो बार होने के बाद मैंने फिर कभी हिम्मत नहीं की| पहली घटना घर छोड़कर जाने की और दूसरी घर में अकेले पड़े दरवाज़ा बंद करके सो जाने की| याद नहीं क्यों लेकिन एक बार किसी वजह से मैं माँ-पापा से नाराज़ हो गया और गुस्सा होकर घर से बाहर चला गया (ये सोचकर कि वापस नहीं आऊंगा) लेकिन पापा भी मेरे पीछे-पीछे आये और मुझे समझा-बुझा कर वापस ले आये| तब तो ठीक था लेकिन जब दोबारा हिम्मत की तो इतनी दांत पड़ी की आगे ये करने की गुंजाइश ही नहीं बची| दूसरी घटना ऐसे हुई कि मैं घर में अकेला था और पापा-मम्मी और दोनों दीदी भी कहीं गए हुए थे| वैसे तो शाम को दस बजे से पहले मैं कभी सोता नहीं लेकिन उस दिन पता नहीं क्यों मेरी आँख लग गयी| और पापा-मम्मी बंद दरवाज़े के बाहर खड़े ठीक १ घंटे तक चिल्लाते रहे| मैं नहीं उठा और जब वो थक गए तो पापा ने खिड़की खोली और १ लठ जो बाहर पड़ा था उसे छुआकर मुझे जगाने की कोशिश की| तब जाकर मैं उठा| पहली बार तो उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा लेकिन जब दोबारा ऐसा हुआ तो फिर मुझे बहुत डांट पड़ी| गनीमत तो यह थी की दोनों बार मैं आगे वाले कमरे में सोया था| अगर पीछे सोया होता तो..........................|

continued in next post..................

Metro and tourism

It is the world of metro - metropolitan cities, metropolitan ideas and metro rails. We often quote the negative aspects of these - they're spreading pollution on roads and in the minds of the people. Let's today see what good things 'metro' especially metro rails have done!!!!!!

The metro rail, initially, was active only in Kolkata. Later on it was introduced in the city of Delhi. This is proving advantageous for people who've to travel long distances for work. Before they used to face traffic on roads but the metros face no traffic. This has improved the transport system in Delhi, and has helped in controlling pollution, reducing traffic on roads and, the greatest thing, in propagating tourism.

But how do metros promote tourism? Actually, they make the tourist spots more accessible. Just think, if there is no traffic, you would certainly like to visit a place more frequently. This is what metros have done. Tourists' arrivals have witnessed an increase of 23.5 % because they've started making frequent visits to India.

By propagating tourism, with the help of well-maintained tourist spots, metros have gained India the 4th rank in 'Dream Destinations of the World'. Conde Naste Travellers, a surveying body, estimated that India's tourist's number is going to swell thus contibuting greatly to Indian economy.

Metros offer one more advantage - they're more secure from terrorist attacks or sabotages than the roadways. Their accident cases are also much less. Many more facilities are provided like electrified railway, e-ticket, etc. Metro rails have also earned the belief of people in timed arrivals.

In this way, metro rails are enhancing tourism in India and also contributing Rs. 21,828 crore to foreign exchange. So, we must encourage the construction of metro rails in other parts of India to repeat the same procedure as in Delhi.

Discover, travel and live
my life I tour on my will
Monuments, stupas and culture
Tourism fills me with thrill.

Note: The statistics used in this article have been sourced from some magazines and newspapers.

Tuesday, February 2, 2010

Beti kyun itni laachar?

बहा करती थी पीयूष स्रोत-सी
खुशियों से तू ओत-प्रोत थी
फिर क्या हो गया है आज?
बेटी क्यों इतनी लाचार?

आज दशा बेटी की कैसी?
हँसी लुप्त क्यों हो गई वैसी,
जिसमें था खुशियों का अगार?
बेटी क्यों इतनी लाचार?

समाज ने बनाया देवी से दासी
आज बेटी जन्मी तो हो गयी त्रासदी?
भ्रूण-हत्या का क्यों हो रही शिकार?
बेटी क्यों इतनी लाचार?

बेटियां गौरव बढ़ाने वाली
सारी समस्याओं को निवारने वाली
आज क्यों लुप्त हुआ ये विश्वास?
बेटी क्यों इतनी लाचार?

फिर जन्म ले नारी की शक्ति
तभी पूर्ण होगी ईश्वर की भक्ति
बेटी ही पुण्यों का आधार
पर बेटी क्यों इतनी लाचार?

अब तो जागो खोलो ये बंदिश
दहेज़, बाल-विवाह ख़त्म करो ये रंजिश
बेटी को दो सारे अधिकार
बेटी क्यों इतनी लाचार ?
बेटी क्यों इतनी लाचार?